कहा जाता है कि यथा राजा तथा प्रजा। यानी यदि राजा अच्छा है, तो प्रजा भी अच्छी होगी। राजा गुणगाहक है, तो प्रजा भी गुणगाहक होगी। राजा कलाओं का कद्रदान है, तो प्रजा भी कलाओं की कद्र करेगी। राजा संस्कृति का पालन और संरक्षण करता है, तो प्रजा भी ऐसा करने वाली होगी। लोकतांत्रिक युग में भले ही राजा नहीं होते, लेकिन यदि जनप्रतिनिधित्व के जरिए चुने गए मुखिया को लोकतांत्रिक राजा मान लें, तो कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश में यह कहावत सटीक बैठती है।
मध्यप्रदेश को भारत का हृदय भी कहा जाता है और जाहिर है, कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े भावों का उद्गम और पल्लवन हृदय में ही होता है। इस व्यंजना के बजाय अभिधा में भी बात करें, तो यह निर्विवाद है कि ललित और लोक कलाओं समेत तमाम कलाओं को संरक्षण देने के मामले में अपना मध्यप्रदेश, देश में अव्वल है। प्रदेश के मुखिया श्री शिवराज सिंह चौहान जमीन से जुड़े नेता हैं और इस मिट्टी की संस्कृति और उसके महत्व से बखूबी वाकिफ हैं। उनके मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश ने सांस्कृतिक जगत में वैश्विक पहचान बनाई है। सोने पर सुहागा यह कि प्रदेश का प्रशासनिक अमला भी महज अधिकारियों-कर्मचारियों का समूह नहीं है, बल्कि भावनाओं से भरपूर प्रतिबद्ध लोगों की ऐसी टीम की तरह है, जो मुख्यमंत्री के स्वप्न को साकार करने के लिए तत्पर रहती है।
मध्यप्रदेश में कला और संस्कृति से जुड़े आयोजन बारहों महीने होते रहते हैं। जिस तरह भारत भूमि पर हर दिन पर्व-त्योहार है, उसी तर्ज पर कह सकते हैं कि प्रदेश में हर दिन कला और संस्कृति के लिए समर्पित है। यह सिर्फ राजधानी भोपाल की बात नहीं है, प्रदेश के कोने-कोने में विशिष्ट आयोजन होते रहते हैं, जिनमें स्थानीय के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को प्रदर्शन के अवसर मिलते हैं। शिवराज सरकार ने सही मायनों में अधिकारों और विकास के साथ-साथ संस्कृति के रूप में खुशियों का भी विकेंद्रीकरण किया है। आनंद मंत्रालय की स्थापना करने वाला यह देश का पहला राज्य है और संस्कृति विभाग की गतिविधियां इस आनंद में चार चांद लगा देती हैं।
यूं तो प्रदेश के पास भारत भवन और रवींद्र भवन जैसी विरासतें पहले से थीं, लेकिन शिवराज सरकार में इनका सार्थक उपयोग हुआ है और ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्य, कला, संगीत और संस्कृति के केंद्र बनकर उभरे हैं। इन केंद्रों में सालभर विशिष्ट आयोजन होते रहते हैं और कला-साहित्य जगत की महत्वपूर्ण हस्तियों का जमावड़ा रहता है। खास बात यह है कि ये केंद्र और इनके आयोजन सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं हैं। इस क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता की भूमिका के साथ प्रदेश ने मिसाल कायम की है। भारत भवन और रवींद्र भवन में विभिन्न प्रदेशों की संस्कृति और साहित्य से परिचित कराने वाले कार्यक्रम भी होते हैं। फिलहाल जारी झारखंड उत्सव एक मिसाल है, जिसके तहत उस प्रदेश के युवा और वरिष्ठ साहित्यकारों को भी रचना-पाठ का अवसर मिल रहा है। पूर्व में राजस्थान, छत्तीसगढ़, बंगाल समेत तमाम राज्यों से जुड़े ऐसे अहम आयोजन हुए हैं और बेशक, भविष्य में भी होते रहेंगे।
जैसा कि आरंभ में कहा गया- यथा राजा तथा प्रजा, तो प्रदेश की जनता भी कलाओं की कद्रदान है। शास्त्रीय, लोक और साहित्य से जुड़े आयोजनों में आम लोगों की मौजूदगी और सक्रियता काबिले-तारीफ होती है। खासतौर पर झीलों के शहर भोपाल को अनूठी पहचान दिलाने में यहां के लोगों का भी अहम योगदान है, जिनसे मिले प्रतिसाद से अभिभूत कलाकार यहां बार-बार आना चाहते हैं। कलाकार और साहित्यकार भोपाल की प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही सामान्य जन की कलाप्रियता और साहित्य वृत्ति के भी मुरीद हो जाते हैं। कला की भाषा में कहें, तो प्रदेश में मुख्यमंत्री, प्रशासन, कलाकारों, साहित्यकारों और आम जनता के बीच खूबसूरत जुगलबंदी चल रही है। उम्मीद है कि यह सिलसिला चलता रहेगा।
मध्यप्रदेश में कला और संस्कृति से जुड़े आयोजन बारहों महीने होते रहते हैं। जिस तरह भारत भूमि पर हर दिन पर्व-त्योहार है, उसी तर्ज पर कह सकते हैं कि प्रदेश में हर दिन कला और संस्कृति के लिए समर्पित है। यह सिर्फ राजधानी भोपाल की बात नहीं है, प्रदेश के कोने-कोने में विशिष्ट आयोजन होते रहते हैं, जिनमें स्थानीय के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को प्रदर्शन के अवसर मिलते हैं। शिवराज सरकार ने सही मायनों में अधिकारों और विकास के साथ-साथ संस्कृति के रूप में खुशियों का भी विकेंद्रीकरण किया है। आनंद मंत्रालय की स्थापना करने वाला यह देश का पहला राज्य है और संस्कृति विभाग की गतिविधियां इस आनंद में चार चांद लगा देती हैं।
यूं तो प्रदेश के पास भारत भवन और रवींद्र भवन जैसी विरासतें पहले से थीं, लेकिन शिवराज सरकार में इनका सार्थक उपयोग हुआ है और ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्य, कला, संगीत और संस्कृति के केंद्र बनकर उभरे हैं। इन केंद्रों में सालभर विशिष्ट आयोजन होते रहते हैं और कला-साहित्य जगत की महत्वपूर्ण हस्तियों का जमावड़ा रहता है। खास बात यह है कि ये केंद्र और इनके आयोजन सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं हैं। इस क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता की भूमिका के साथ प्रदेश ने मिसाल कायम की है। भारत भवन और रवींद्र भवन में विभिन्न प्रदेशों की संस्कृति और साहित्य से परिचित कराने वाले कार्यक्रम भी होते हैं। फिलहाल जारी झारखंड उत्सव एक मिसाल है, जिसके तहत उस प्रदेश के युवा और वरिष्ठ साहित्यकारों को भी रचना-पाठ का अवसर मिल रहा है। पूर्व में राजस्थान, छत्तीसगढ़, बंगाल समेत तमाम राज्यों से जुड़े ऐसे अहम आयोजन हुए हैं और बेशक, भविष्य में भी होते रहेंगे।
जैसा कि आरंभ में कहा गया- यथा राजा तथा प्रजा, तो प्रदेश की जनता भी कलाओं की कद्रदान है। शास्त्रीय, लोक और साहित्य से जुड़े आयोजनों में आम लोगों की मौजूदगी और सक्रियता काबिले-तारीफ होती है। खासतौर पर झीलों के शहर भोपाल को अनूठी पहचान दिलाने में यहां के लोगों का भी अहम योगदान है, जिनसे मिले प्रतिसाद से अभिभूत कलाकार यहां बार-बार आना चाहते हैं। कलाकार और साहित्यकार भोपाल की प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही सामान्य जन की कलाप्रियता और साहित्य वृत्ति के भी मुरीद हो जाते हैं। कला की भाषा में कहें, तो प्रदेश में मुख्यमंत्री, प्रशासन, कलाकारों, साहित्यकारों और आम जनता के बीच खूबसूरत जुगलबंदी चल रही है। उम्मीद है कि यह सिलसिला चलता रहेगा।